Sunderlal Bahuguna Biography : Death Reason , Chipko movement , Family , Children , Height , Age & More

Sunderlal Bahuguna Biography : Death Reason , Chipko movement , Family , Children , Height , Age & More

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Sunderlal Bahuguna Biography

आज हम इस पोस्ट के माध्यम से एक महान व्यक्ति के बारे में बात करने जा रहे हैं जिनका नाम है सुंदरलाल बहुगुणा यह वह व्यक्ति हैं जिनके बारे में हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं और ना जाने कब तक पढ़ते रहेंगे क्योंकि इनके विचार और इनके द्वारा जो कुछ किया गया वहां सब कुछ अमर रहेगा क्योंकि सुंदरलाल एक महान व्यक्ति हैं इनके द्वारा ही सभी लोगों को याद हो तो चिपको आंदोलन चलाया था जिसके द्वारा पेड़ों की सुरक्षा की गई थी

जिसकी वजह से आज हम जीवित है आप लोगों को पता है कि जीवन जीने के लिए पेड़ का होना भी जरूरी है उसी प्रकार से सुंदरलाल ने अपना जीवन त्यागने के लिए तैयार हो गए थे पेड़ों को बचाने के लिए कब से चिपको आंदोलन हम किताबों में पढ़ते आ रहे हैं और पढ़ते रहेंगे लेकिन वही Sunderlal Bahuguna हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके विचार उनके द्वारा कुछ किया गया वहां अमर रहेगा और हम उनके कदमों पर चलने की कोशिश करेंगे तो चलो आज हम कुछ ऐसे तथ्य से फैक्ट जानने की कोशिश करते हैं जिन्हें हर व्यक्ति को जानना चाहिए और अपने जीवन में अपनाना चाहिए |

Who is Sunderlal Bahuguna

Sunderlal Bahuguna वह महान व्यक्ति है जिनके द्वारा ऐसे कार्य किए गए पूरे जीवन काल में ही हमेशा उनके कार्य उनके विचार अमर रहेंगे यह वह व्यक्ति हैं जिन्होंने चिपको आंदोलन चलाया जिसकी वजह से ना जाने कितने पेड़ों की सुरक्षा की गई जिससे जो जीवन जी रहे हैं हम आजकल वह पेड़ों की वजह से ही रहे हैं और सुंदरलाल जैसे महान व्यक्तियों ने इन पेड़ों की सुरक्षा के लिए अपना जीवन त्यागने के लिए भी तैयार हो गए थे |

सबसे प्रमुख नेताओं में से एक सुंदरलाल बहुगुणा, एक गांधीवादी कार्यकर्ता और दार्शनिक हैं, जिनकी श्रीमती गांधी से अपील के परिणामस्वरूप हरित प्रतिबंध लगा और जिनका 1981-83 में 5,000 किलोमीटर ट्रांस-हिमालयी पैदल मार्च चिपको संदेश फैलाने में महत्वपूर्ण था। .

Sunderlal Bahuguna Biography in hindi

NameSunderlal Bahuguna
Real NameSunderlal Bahuguna
Born9 January 1927 (age 94 years), Maroda
NationalityIndian
SpouseVimla Bahuguna
Children3
AwardsRight Livelihood Award, Padma Vibhushan
BooksDharti Ki Pukar, India`s Environment: Myth And Reality, MORE
FatherYet to Update
MotherYet to Update

 

Age94
Death Date21 may 2021
Death ReasonCovid-19
OccupationActivist Gandhian environmentalist
workThe idea of Chipko movement was of his wife and the action was taken by him

Sunderlal Bahuguna Death Reason

पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का ऋषिकेश अस्पताल में कोविड से निधन। ऋषिकेश (यूकेडी), 21 मई (पीटीआई) पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के अग्रणी सुंदरलाल बहुगुणा का कई दिनों तक कोविड-19 से जूझने के बाद शुक्रवार को यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया। वह 94 . के थे

Sunderlal Bahuguna Family

सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखंड के टिहरी के पास मरोदा गाँव में हुआ था। उन्होंने कोलकाता में आयोजित एक समारोह में दावा किया था कि उनके पूर्वज, जिनका उपनाम बंद्योपाध्याय था, 800 साल पहले बंगाल से टिहरी चले गए थे।
जन्म: 9 जनवरी 1927 (उम्र 94); मरोदा, टिहरी…
व्यवसाय: कार्यकर्ता; गांधीवादी; पर्यावरणविद्
जीवनसाथी : विमला बहुगुणा

What is Sunderlal Bahuguna famous for?

सुंदरलाल टिहरी बांध के निर्माण को रोकने के अपने काम के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं। यह बांध हिमालय पर्वत से गंगा नदी के प्रवाह को प्रभावित करता है। टिहरी दामियों की मंशा पहाड़ी गांवों से पानी को भटकने से रोकने और नई दिल्ली में जल प्रवाह बढ़ाने की है।

Who is founder of Chipko movement?

सबसे प्रमुख नेताओं में से एक सुंदरलाल बहुगुणा, एक गांधीवादी कार्यकर्ता और दार्शनिक हैं, जिनकी श्रीमती गांधी से अपील के परिणामस्वरूप हरित प्रतिबंध लगा और जिनका 1981-83 में 5,000 किलोमीटर ट्रांस-हिमालयी पैदल मार्च चिपको संदेश फैलाने में महत्वपूर्ण था।

Sunderlal Bahuguna Image/Photos

Sunderlal Bahuguna Biography : Death Reason , Chipko movement , Family , Children , Height , Age & More
Sunderlal Bahuguna Photos -Credit-Sunderlala Bahuguna
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What is famous for Chipko movement?

चिपको आंदोलन, जिसे चिपको आंदोलन भी कहा जाता है, 1970 के दशक में ग्रामीण ग्रामीणों, विशेष रूप से महिलाओं द्वारा अहिंसक सामाजिक और पारिस्थितिक आंदोलन, जिसका उद्देश्य सरकार समर्थित लॉगिंग के लिए पेड़ों और जंगलों की रक्षा करना था।

Chipko Andolan ( Chipko movement )

जिस आंदोलन के बारे में हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं आज उसी आंदोलन की बात करने जा रहे हैं यहां ऐसी जानकारियां हैं जो कि हम से पहले या हमारे बाद भी हमेशा के लिए अमर रहेंगे |
चिपको आंदोलन या चिपको आंदोलन, भारत में वन संरक्षण आंदोलन था। यह 1973 में उत्तराखंड में शुरू हुआ, फिर उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा (हिमालय की तलहटी में) और पूरी दुनिया में कई भविष्य के पर्यावरण आंदोलनों के लिए एक रैली स्थल बन गया।

Who is the father of chipko?

चिपकू आंदोलन को चलाने वाले एक महान व्यक्ति जिन्हें दुनिया याद रखेगी |
चिपको आंदोलन ने एक पर्यावरण कार्यकर्ता सुंदरलाल बहुगुणा के तहत कर्षण प्राप्त किया, जिन्होंने अपना जीवन जंगलों और हिमालयी पहाड़ों के विनाश के विरोध में ग्रामीणों को समझाने और शिक्षित करने में बिताया। उनका ही प्रयास था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पेड़ काटने पर प्रतिबंध लगा दिया |

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Sunderlal Bahuguna Story & career

सुंदरलाल बहुगुणा चिपको आंदोलन के नेता थे उन्होंने अपने जीवन काल में ऐसे महान कार्य किए हैं जो कि हमेशा अमर रहेंगे इनके विचार इनके द्वारा जो किया गया वहां हमेशा याद रहेगा सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को उत्तराखंड में टिहरी के पास मरोदा गांव में हुआ था |

जब वे 13 वर्ष के थे, तब उनकी मुलाकात गढ़वाल के एक स्वतंत्रता सेनानी देव सुमन से हुई, और वे राष्ट्रवादी कारणों से विशेष रूप से सविनय अवज्ञा के गांधीवादी तरीकों का उपयोग करते हुए आकर्षित हुए।

उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में पर्चे बांटना और सभाओं और विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करना शुरू कर दिया।

सुंदरलाल बहुगुणा 18 साल की उम्र में वे पढ़ने के लिए लाहौर चले गए। उन्होंने बचपन से ही सोच लिया था कि आगे चलकर महान कार्य करने हैं उन्होंने हरिजनों के मंदिरों में प्रवेश के अधिकारों के लिए भी अभियान चलाया।

इस प्रकार से कई तरह के अभियान चलाए ताकि आगे आने वाले जीवन को किसी भी प्रकार का कोई भी नुकसान ना हो बल्कि आगे आने वाला जीवन इस पुराने काल के अभियान को याद करें जब उन्होंने 23 वर्षीय विमला से शादी की तो उन्होंने एक गांव में रहने और

पहाड़ियों में एक आश्रम स्थापित करने का फैसला किया। बाद में उन्होंने टिहरी और उसके आसपास शराब के सेवन के खिलाफ एक अभियान का नेतृत्व किया। 1960 के दशक में उन्होंने अपना ध्यान हिमालय में वनों के संरक्षण और वृक्षों के आवरण की ओर लगाया।सच में ऐसे ऐसे महान कार्य किए जिन्हें हमेशा याद रखा जा सकता है |

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सुंदरलाल बहुगुणा के द्वारा 1970 के दशक में एक आंदोलन जो हिमालय में उत्पन्न हुआ था, भारत और उसके बाहर पर्यावरणविदों के लिए एक रैली स्थल बन गया, और आज इसे देश के आधुनिक पर्यावरण आंदोलन में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाता है।
वह आंदोलन जिसे आज भी हम किताबों में पढ़ते हैं |

यह चिपको आंदोलन था। उस दशक की शुरुआत में गढ़वाल हिमालय में पेड़ों की कटाई के खिलाफ एक शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहा था। 26 मार्च, 1974 को एक फ्लैशपॉइंट पर पहुंच गया, जब चमोली जिले में गांव की महिलाओं के एक समूह ने पेड़ों को गिरने से रोकने के लिए उन्हें गले लगाया। जल्द ही विरोध दूर-दूर तक फैल गया।

इस प्रकार से जीवन का लागे बड़ी रहा था और ऐसे ऐसे महान कार्य करते जा रहे थे सुंदरलाल बहुगुणा 1980 के दशक की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय से होते हुए 5,000 किलोमीटर की यात्रा करके आंदोलन को और भी लोकप्रिय बना दिया। उन्होंने जागरूकता फैलाने और इसके लिए समर्थन जुटाने के लिए क्षेत्र के सैकड़ों गांवों का दौरा किया।

उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से भी मुलाकात की, एक बैठक के बारे में कहा जाता है कि इस क्षेत्र में 15 वर्षों के लिए हरे पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

इस प्रकार से उन्होंने अभियान चलाकर ना जाने कितने ऐसे कार्य किए जो कि प्रकृति की रक्षा के लिए अपने प्राण त्यागने के लिए भी तैयार हो गए थे

लेकिन यह बात सभी लोगों को पता है कि भगवान ने हर किसी को एक सीमित समय के लिए पृथ्वी पर भेजा है और कुछ इस प्रकार से ही सुंदर लाल बहुगुणा को भी इस धरती पर भेजा था उन्होंने प्रकृति की रक्षा की इसलिए उन्होंने अपना जीवन काल बहुत समय तक जिया अंतिम समय में 94 वर्ष की थी आप सूची सकते हैं की वर्तमान समय में 94 वर्ष की उम्र में जी रहा है मनुष्य अपनी जरूरत पूरी करने के लिए कार्य किए जिनकी वजह से आने वाले मनुष्यों के लिए यही प्रकृति नुकसान पहुंचाएगी |

बहुगुणा ने जिस अन्य प्रमुख अभियान का नेतृत्व किया, वह भागीरथी नदी पर टिहरी बांध और इसके कारण होने वाले प्रतिकूल पारिस्थितिक प्रभावों के खिलाफ था। उन्होंने बांध निर्माण के खिलाफ कई भूख हड़ताल की, जिसमें प्रधान मंत्री पी.वी. के कार्यकाल के दौरान डेढ़ महीने का उपवास भी शामिल था। नरसिम्हा राव।

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हालांकि, शांतिपूर्ण विरोध के वर्षों के बावजूद, बांध पर काम फिर से शुरू हुआ और 2004 में जब बांध जलाशय भरने लगा, तो उन्हें नदी के पास एक छोटी सी पहाड़ी कोटी में जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने एक साक्षात्कार में rediff.com को बताया: “यह [बांध का निर्माण] स्थायी समस्या का एक अस्थायी समाधान है।

इससे सबसे अमीर किसान को फायदा होगा, टिहरी के जंगल उखड़ जाएंगे। इसका लाभ पश्चिमी यूपी के अमीर किसानों और दिल्ली के निवासियों को मिलेगा। उनका कहना है कि बांध भूकंप का सामना करेगा। लेकिन ये पहाड़ियाँ नहीं होंगी। कुछ पहाड़ियों में पहले से ही दरारें दिखाई दे रही हैं। बांध टूटा तो 12 घंटे के अंदर बुलंदशहर तक का पूरा इलाका खत्म हो जाएगा। चारों ओर देखिए, अमेरिका भी उनके बड़े बांध तोड़ रहा है।”

सुंदरलाल बहुगुणा ने हमेशा अपने जीवन काल में कभी भी हार नहीं मानी थी उन्हें खुद पर इतना विश्वास हो गया था कि अगर वे प्रकृति को बचाना चाहे तो प्रकृति भी उनकी मदद करने लगती है यह बात आप लोग समझ सकते हैं कि इसी प्रकृति की वजह से हम जीवित हैं और हमारी वजह से प्रकृति ही बनते हैं तो हम क्यों इस प्रकृति को नष्ट करने में लगे हुए हैं |
असफलता के बावजूद, बहुगुणा के अभियान जारी रहे, जिससे देश के विभिन्न हिस्सों में कई अन्य युवा हरित योद्धाओं को प्रेरणा मिली। 2009 में, भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। लेकिन जैसा कि जून 2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ ने दिखाया,

हमेशा से अपने जीवन काल में यही प्रचार प्रसार किया है कि प्रकृति की रक्षा की जाए और समाज सेवा की जाए राज्य और केंद्र दोनों की सरकारें उनकी चेतावनियों पर ध्यान नहीं दे रही थीं। उन्होंने बाढ़ के बाद आउटलुक पत्रिका को बताया: “चिपको के बाद कई अन्य आंदोलन हुए हैं

जो स्थानीय संसाधन-आधारित अर्थव्यवस्था पर जोर दे रहे हैं, पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों और हमारी नदियों की रक्षा कर रहे हैं। ग्रामीण लोगों की आवाज कब सुनी गई है?

सरकार ने हमेशा दावा किया कि उनका [लोगों का] कारण भावनात्मक था लेकिन वे इस आपदा के बाद ऐसा नहीं कह सकते। यह एक सबक है और हमें अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए। इस प्रकार से सुंदरलाल बहुगुणा ने अपने जीवन काल में हमेशा से प्रकृति के बारे में सोचा और समाज सेवा के बारे में सोचा |

हमें आशा है कि आप को सुंदरलाल बहुगुणा के बारे में जानकर बहुत खुशी हुई होगी क्योंकि यह हुआ महान व्यक्ति हैं जिनके बारे में हम बचपन से किताबों में पढ़ते आ रही हैं चिपको आंदोलन इनके द्वारा चलाया गया था जिसे कोई भी भुलाया नहीं जा सकता क्योंकि चिपको आंदोलन वह आंदोलन है

जिन्हें पेड़ों को बचाने के लिए गांव वाले पेड़ों से चिपक गए थे तब से उसका नाम चिपको आंदोलन रख दिया गया एक महान कार्य था प्रकृति को बचाने के लिए एक ऐसा कदम जो कि हमेशा अमर रहेगा और हमेशा इस कार्य को दुनिया याद करती रहेगी |

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